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प्रतिभा पर आरक्षण भारी ( सामना, दैनिक जागरण,नेशनल दुनिया में प्रकाशित )

     आदर्श तिवारी -


आरक्षण पर बहस अभी चल ही रही थी कि सुप्रीम कोर्ट के एक निर्देश ने इसे और आगे बढ़ा दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने दुःख जताते हुए कहा कि उच्च शिक्षण संस्थाओं से सभी प्रकार के आरक्षणों को समाप्त कर देना चाहिएं.कोर्ट ने मंगलवार को आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और तमिलनाडु में सुपर स्पेशयलिटी कोर्सेज को लेकर योग्यता मानको को चुनौती देने के संबंध में दायर याचिका पर सुनवाई  के दौरान ये बातें कहीं .सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को ये याद दिलाया कि देश को आज़ाद हुए 68 वर्ष हो गए,लेकिन वंचितों के लिए जो सुविधाएँ उपलब्ध कराई गई थी,उनमें कोई बदलाव नहीं हुआ हैं.इसके साथ ही कोर्ट ने केंद्र सरकार को राष्ट्रहित को ध्यान में रखतें हुए इस संदर्भ में उपयुक्त कदम उठाने की बात कही है. न्यायधीश दीपक मिश्रा और न्यायधीश पीसी पंत की बेंच ने कहा कि सुपर स्पेशयलिटी कोर्सेज़ में चयन का प्रारम्भिक मापदंड मेरिट ही होनी चाहिएं. उनके मुताबिक मेरिट बनाने के लिए केंद्र
और राज्य सरकारों को कई बार स्मरण दिलाने के बाद भी स्थिति जस की तस बनी हुई है.कोर्ट ने आगे कहा कि मेरिट पर आरक्षण का आधिपत्य रहता है,अब समय आ गया है कि उच्च शिक्षण संस्थानों की गुणवत्ता में सुधार किया जाए, साथ ही मौजूद स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता बढ़ाकर देश के लोगो की मदद की जाए.मौजूदा परिस्थितियों पर गौर करें तो कोई भी राजनीतिक दल आरक्षण को समाप्त करने की बात तो दूर उसकी समीक्षा की बात कहने तक से हिचकिचाते है.ऐसे में आरक्षण खत्म करना दूर की कौड़ी है.आरक्षण को खत्म हरगिज़ नहीं किया जा सकता, वंचितों और समाज के सबसे पिछड़े पायदान पर रहने पर रहने वाले गरीब लोगो को मुख्यधारा में लाने के लिए आरक्षण सहायक है.लेकिन,ये भी सही है कि आज आरक्षण का इस्तेमाल वैसाखी के रूप  से हो रहा है.असल में जिन दलित,अल्पसंख्यक या अन्य वंचित जातियों को आरक्षण की जरूरत है,उन्हें ये लाभ अभी तक नहीं मिल पा रहा है.जिसके जिम्मेदार हमारे राजनेता है.हमारे राजनीतिक दलों ने आरक्षण के नाम पर समाज को पहले विभाजित किया फिर आरक्षण के बहाने खूब सियासत साधने का काम हमारे हुक्मरानों ने किया और अब भी कर रहे हैं. इनके इस रवैये से देश में व्यापक बहस जो आरक्षण को लेकर होनी चाहिएं थी वो आज तक नही हुई.नतीजन आज आरक्षण के लिए कुछ समुदाय हिंसा पर भी उतारू हो चलें हैं.इस पर भी सरकारें मौन रहती है..बहरहाल,जब आरक्षण को लागू करने के बात आई थी तब संविधान सभा के अध्यक्ष डा.अम्बेडकर ने कहा था कि हर दस साल के बाद सरकार इसकी समीक्षा करेगी कि जिनको आरक्षण दिया जा रहा है उनकी स्थिति में कुछ सुधार हुआ या  नहीं? उन्होंने ये भी स्पष्ट किया कि यदि किसी वर्ग का विकास हो जाता है तो उसके आगे की पीढ़ी को इस व्यवस्था से वंचित रखा जाए.इस समीक्षा का मतलब ये था कि जिन उद्देश्यों के लिए आरक्षण को प्रारम्भ किया गया है.वो कितनी कारगर साबित हुई है.लेकिन आज तक किसी राजनीतिक दल में इतनी शक्ति नहीं हुई की आरक्षण की समीक्षा करवा सकें. गौरतलब है कि पिछले माह आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने अपने एक बयान में कहा था कि आरक्षण का इस्तेमाल राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए हो रहा है तथा इस बात की समीक्षा करने की जरूरत है कि आरक्षण की जरूरत किसे और कब तक है. पूरे राजनीतिक गलियारे में संघ प्रमुख के इस बयान का पुरजोर विरोध हुआ था. सनद रहें कि समीक्षा का मतलब आरक्षण खत्म करना नही होता. इसका मतलब केवल इतना ही है कि आरक्षण का लाभ गरीब व पिछड़ो तथा जो इसके लाभार्थी है उन तक पहुँचाना है.आरएसएस और बीजेपी का रिश्ता जगजाहिर है.इसके बावजूद सत्तारूढ़ बीजेपी ने भी संघ प्रमुख के इस बयान से अपने को अलग रखते हुए सरकार की तरफ से बकायदा प्रेस कांफ्रेंस कर के कहा कि आरक्षण को लेकर जो व्यवस्था चली आ रही है,भारत सरकार उसके साथ कोई छेड़छाड़ नहीं करेगी अर्थात जैसे सबको आरक्षण मिल रहा उसी अनुसार मिलता रहेगा रहेगा.अब देखने वाली बात होगी की सुप्रीम कोर्ट के इस टिप्पणी को सरकार कितने गंभीरता से लेती है.बहरहाल,वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षा में आरक्षण को लेकर जो चिंता जताई है इस पर सरकार को विचार करना होगा.आरक्षण खत्म करना समाज के वंचित वर्ग के साथ बेमानी होगी परन्तु अब समय आ गया कि सरकार आरक्षण की समीक्षा करें एवं इसके मानको में बदलाव करें क्योंकि आज हमारे देश के युवाओं के पास योग्यता की कमी नही है.आज के छात्र प्रतिभा के धनी है.लेकिन आरक्षण के आगे उनकी प्रतिभा तथा उनकी योग्यता धरी की धरी रह जाती है.अब सवाल ये उठता है कि क्या योग्यता पर आरक्षण भारी भर रहा है ?इस सवाल की तह में जाएँ तो इसके कोई दो राय नहीं कि आरक्षण योग्यता की तौहीन कर आगे निकल जा रहा है.आज 10 से 15 फीसदी अंक पाने वाले छात्रों को प्रवेश मिल जाता है किंतु वही अपनी मेहनत और लगन से अध्ययन करने वाले छात्रों को आरक्षण की मार झेलनी पडती है अर्थात उसे दाखिला नही मिलता है.आरक्षण की नीति में खोट के कारण छात्रों को कितने दिक्कतों का सामना करना पड़ता है,क्या किसी राजनीतिक दल ने वोट बैंक से  इतर इस बात को कभी सोचा है ? किसी राजनीतिक दल ने आरक्षण की इस खोट को दूर करने का प्रयास किया है ?आज स्थिति ये है कि कम अंक पाने वालें छात्र आरक्षण के सहारे चिकित्सक बन जातें है और योग्य छात्र हाथ मलते रह जाते हैं. अब आप खुद कल्पना कर सकतें है कि जो महज 5 फीसदी अंक पाकर चिकित्सक बन रहें है.वो किसी मरीज के लिए लाभकारी कैसे होंगे? ये बात किसी से छिपी नही है कि उच्च संस्थानों में आरक्षण से सीट हासिल करने वालें छात्रों का प्रदर्शन बहुत अच्छा नही रहता.इसी में मद्देनजर सुप्रीम कोर्ट ने ये टिप्पणी किया है.एक बात तो स्पष्ट है कि आरक्षण में सुधार की दरकार है.अगर हम सुधार की बात करें तो हमारे पास आरक्षण के खोट को दूर करनें के कई उपाय है.मसनल सरकार आरक्षण को आर्थिक रूप से लागू करती है तो इसके अनेकानेक लाभ है.गरीब हर वर्ग के लोग है.चाहें वो दलित हो या सवर्ण अगर सभी को आर्थिक आधार मान कर आरक्षण दिया जाएँ तो सभी तबके के गरीब लोगो को इससे मदद मिलेगी और आरक्षण उनके विकास में सहायक सिद्ध होगा.हमारी गरीबी को लेकर जो लड़ाई है उसमें आरक्षण मिर का पत्थर साबित हो सकता है तथा तक जहाँ शिक्षा में आरक्षण का सवाल है, उच्च शिक्षण संस्थानों में चयन सिर्फ मेरिट के आधार पर होनी चाहिए जिससे छात्रो के प्रतिभा को सम्मान मिल सकें उनके उस परिश्रम का लाभ उन्हें प्राप्त हो सकें.इन सब के बीच एक सवाल बना हुआ है कि क्या सरकार आरक्षण की  समीक्षा करने की हिम्मत दिखाएगी ?

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