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दैनिक जागरण (राष्ट्रिय संस्करण ) में प्रकाशित



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काश यादें भी भूकंप के मलबे. में दब जातीं ..

    एक दिन बैठा था अपनी तन्हाइयों के साथ खुद से बातें कर रहा था. चारों तरफ शोर –शराबा था, लोग भूकम्प की बातें करते हुए निकल रहें थे साथ ही सभी अपने–अपने तरीके से इससे  हुए नुकसान का आंकलन भी कर रहें थे.  मै चुप बैठा सभी को सुन रहा था. फिर अचानक उसकी यादों ने दस्तक दी और आँखे भर आयीं. आख  से निकले हुए अश्क मेरे गालों को चूमते  हुए मिट्टी में घुल–मिल जा रहें थे मानों ये आसूं उन ओश की बूंदों की तरह हो जो किसी पत्ते को चूमते हुए मिट्टी को गलें लगाकर अपना आस्तित्व मिटा देती हैं. उसी  प्रकार मेरे आंशु भी मिट्टी में अपने वजूद को खत्म कर रहें थे. दरअसल उसकी याद अक्सर मुझे हँसा भी जाती है और रुला भी जाती है. दिल में एक ऐसा भाव जगा जाती है जिससे मै खुद ही अपने बस में नहीं रह पाता, पूरी तरह बेचैन हो उठता. जैसे उनदिनों जब वो  मुझसे मिलने आती तो अक्सर लेट हो जाती,मेरे फोन का भी जबाब नहीं देती, ठीक इसी प्रकार की बेचैनी मेरे अंदर उमड़ जाती थी. परन्तु तब के बेचैनी और अब के बेचैनी में  एक बड़ा फर्क है, तब देर से ही सही  आतें ही उसके होंठों से पहला शब्द स...

डिजिटल इंडिया को लेकर सरकार गंभीर

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी महत्वकांक्षी योजना डिजिटल इंडिया को साकार करने के लिए सिलिकाँन वैली में तकनीक क्षेत्र की सभी दिग्गज कंपनियों के प्रमुखों से मुलाकात की . प्रधानमंत्री मोदी ने डिजिटल इंडिया के उद्दश्यों व लक्ष्यों के बारें इन सभी को बताया.तकनीक जगत सभी शीर्षस्थ कंपनियां मसलन गूगल,माइक्रोसॉफ्ट तथा एप्पल के सीईओ ने भारत सरकार की इस योजना का स्वागत करते हुए, भारत में निवेश को लेकर अपने –अपने प्लानों के दुनिया के सामने रखतें हुए भारत को भविष्य की महाशक्ति बताया है. इन सभी कंपनियों को बखूबी मालूम है कि भारत आज सभी क्षेत्रों  नए- नए आयाम गढ़ रहा है. इसको ध्यान में रखतें हुए गूगल के सीईओ सुंदर पिचई ने भारत के 500 रेलवे स्टेशनों को वाई -फाई से लैस करवाने के साथ 8 भारतीय भाषाओं में इंटरनेट की सुविधा देने की घोषणा की तो वहीँ माइक्रोसॉफ्ट ने भी भारत में जल्द ही पांच लाख गावों को कम लागत में ब्रोडबैंड तकनीकी पहुँचाने की बात कही है.इस प्रकार सभी कंपनियों के सीईओ ने भारत को डिजिटल बनाने के लिए हर संभव मदद के साथ इस अभियान के लिए प्रधानमंत्री मोदी से कंधा से कंधा ...

विरोध की मुनादी के बीच कराहता सच

  देश कोरोना महामारी की चपेट में है. हर तरफ स्थिति चुनौतीपूर्ण बनी हुई है. यह समय सबको साथ मिलकर इस महामारी से मुकाबला करने का है किन्तु यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारत में यह संभव होता नहीं दिखाई दे रहा है. इसके पीछे कारण बहुत दिख जाएंगे  फ़िलहाल इसका प्रमुख कारण क्षुद्र राजनीति ही दिखाई पड़ रही है. देश में बुद्धिजीवियों की एक बड़ी जमात है जो पुरस्कार वापसी, असहिष्णुता, लोकतंत्र खतरे में है, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दमन हो रहा है कि मुनादी 2014 से पीट रहे हैं बस हर बार इनकी मुनादी चिकना घड़ा साबित हुई है. वैसे तो देश ने हर मोर्चे पर इनका दोहरा रवैया देखा है, लेकिन अब इनके क्रूर आचरण से भी देश भलीभांति वाकिफ हो गया है. यह कबीला समय, अवसर अथवा परिस्थिति के अनुसार अपना एजेंडा तय नहीं करते, बल्कि कोई भी समय हो, काल हो, परिस्थिति हो यह अपने एजेंडे पर पूरी तरह दृढ़ता के साथ खड़े रहते है. कोरोना की दूसरी लहर में शुरू से देखें तो राजनीतिक दलों से कहीं ज्यादा यह लोग सक्रिय नजर आ रहे हैं  मानों समूचे विपक्ष ने अपना दायित्व इनके कंधो पर डाल दिया है. इन्होनें एक-एक कर नरेंद्र मोदी के खिला...