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एनआरसी पर सियासत के मायने

एनआरसी का ड्राफ्ट आज संसद से सड़क तक चर्चा का केंद्रबिंदु बना हुआ है, सभी विपक्षी दल इस मुद्दे पर जनता को भ्रमित करने का प्रयास कर रहें है,वहीँ बीजेपी का स्पष्ट कहना है कि घुसपैठियों के मसले पर सभी दलों को अपना मत स्पष्ट करना चाहिए,देश की सुरक्षा के साथ भाजपा कोई समझौता नहीं करेगी, लेकिन इसे देश का दुर्भाग्य ही कहेंगे कि भाजपा को छोड़ कोई राजनीतिक दल एनआरसी की महत्ता को समझने की कोशिश नहीं कर रहा अपितु वह अपने राजनीतिक रणनीति के जोड़ –घटाव में लगा हुआ है. भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने पहले राज्यसभा में जिस आक्रमकता के साथ एनआरसी पर राजीव गाँधी के हवाले से कांग्रेस को घेरा इससे कांग्रेस पूरी तरह बौखला गई. अमित शाह ने कांग्रेस की दोमुंही राजनीति को बेनकाब करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी. कांग्रेस घुसपैठियों के मामले में खतरनाक राजनीति कर रही है.सदन के अंदर तथा इस मुद्दे पर प्रेस कान्फ्रेंस में अमित शाह ने बार –बार साहस और हिम्मत जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया.आखिर इन दो शब्दों के क्या मायने निकाले जाएँ ? दरअसल घुसपैठियों को कांग्रेस ,टीएमसी दल अपने वोटबैंक के नजरिये से देखते हैं ,इस मसौदे के ...

अविश्वास प्रस्ताव के सबक

    भारत के संसदीय इतिहास में विगत शुक्रवार का दिन कई मायने में ऐतिहासिक रहा. विपक्षी दलों द्वारा उस सरकार के खिलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव लाने का दुस्साहस किया गया, जिसे भारत की जनता ने प्रचंड बहुमत से देश की कमान सौंपी है. एनडीए सरकार के खिलाफ़ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव का हश्र क्या होगा इसको लेकर किसी के मन में कोई शंका नहीं रही होगी. वर्तमान में एनडीए को छोड़ भी दें, तो भी भाजपा अपने दम पर सत्ता में बनी रह सकती है अगर इसमें एनडीए को मिला दें तो संख्या बल 311 पर जाकर थमता है, जो बहुमत के जादूई आंकड़े 268 से कहीं ज्यादा है. देश राहुल गाँधी और नरेंद्र मोदी के भाषण की तासीर को समझने में लगा है किन्तु इन सबके बीच पहला सवाल यही खड़ा होता है की विपक्ष द्वारा अविश्वास प्रस्ताव की जरूरत क्या थी? किस रणनीति को साधने के लिए कांग्रेस ने टीडीएस के कंधो पर बंदूख रखा? दरअसल,आम चुनाव जैसे–जैसे करीब आ रहा है विश्वास की कसौटी पर रसातल में पहुँच चुकी कांग्रेस झूठ, फ़रेब और अफ़वाह फैलाने के एक भी हथकंडे को छोड़ना नहीं चाहती. अप्रसांगिकता के दौर से गुजर रहे राहुल गाँधी चर्चा में बने रहने के लिए...

अखिलेश का अशोभनीय कृत्य

     हमारे देश के राजनेताओं को सत्ता का रसूख इतना भाता है कि वह अपने सियासी आडंबर से जरा भी समझौता करना पसंद नहीं करते. यही कारण है कि सरकारी बंगला,सुरक्षा,गाड़ी का   लब्बोलुआब उन्हें अपने गिरफ़्त में ले लेता है. राजनीति में जो मर्यादा, शुचिता एवं सहजता की स्थिति थी, अब वह बीते दिनों की बात हो चुकी है. वर्तमान में देश के राजनेताओ को सुख-सुविधा एवं वीआईपी संस्कृति ने अपने गिरफ़्त में ले रखा है. यह सर्वविदित सत्य है की सत्ता से बाहर होने के बाद सरकारी सुविधाओं को त्यागना पड़ता है अथवा उसमें भारी कटौती भी देखने को मिलती है. सरकारी सुविधाओ के प्रोटोकॉल की एक प्रक्रिया है, जिसमें राष्ट्रपति एवं प्रधानमंत्री सहित पूर्व प्रधानमंत्री तथा पूर्व राष्ट्रपति, मंत्री ,मुख्यमंत्री सांसद एवं विधायक गण आते हैं. इस समय उत्तर प्रदेश में पूर्व मुख्यमंत्रियों का सरकारी बंगला छोड़ना चर्चा के केंद्र बिंदु में है. सबसे बड़े सूबे में पूर्व मुख्यमंत्रियों को कोर्ट ने झटका देते हुए वर्षों से कब्ज़ा जमाए सरकारी बंगले को छोड़ने का आदेश दिया था. यह आदेश उत्तर प्रदेश के प्रमुख छत्रपों पर कहर की...

हिंसा की राजनीति पर लगाम जरूरी

भारत जैसे विविधताओं और महान लोकतांत्रिक देश में जब राजनीतिक हत्याओं के मामले सामने आते हैं तो निश्चित तौर पर, वह लोकतंत्र को मुंह चिढ़ा रहे होते हैं.राजनीतिक हत्या न केवल भारत के विचार –विनिमय   की संस्कृति को चोट पहुंचाते हैं बल्कि, यह सोचने पर मज़बूर करते हैं कि राजनीति में अब सियासी भाईचारे की जगह बची है अथवा नहीं ? रक्तरंजित राजनीति के लिए दो राज्य हमेशा चर्चा के केंद्र बिंदु में रहते हैं.पहला पश्चिम बंगाल और दूसरा केरल इन दोनों में वामपंथी शासन के दौरान राजनीतिक हिंसा को खूब फलने फूलने दिया गया और इसका इस्तेमाल अपनी सियासी ताकत की आजमाइश और तुष्टीकरण के लिए किया जाने लगा. उसी का परिणाम है कि आज रक्तरंजित राजनीति की घटनाएँ लगातार बढ़ रहीं तथा अपने स्वरूप को और भी क्रूरता   के साथ पेश करने से नहीं हिचक रहीं. बंगाल की सियासत में राजनीतिक हिंसा कोई नहीं बात नहीं है किन्तु जब वामपंथी शासन से बंगाल को मुक्ति मिली थी, तब ऐसा अनुमान लगाया गया था कि ममता बनर्जी के आने से यह कुप्रथा समाप्त होगी अथवा कमी आएगी लेकिन, इस अनुमान के साथ बड़ा छलावा हुआ ममता बनर्जी के शासनकाल में जिस तरह...

कर्नाटक में स्थायी सरकार जरूरी

कर्नाटक विधानसभा चुनाव के परिणाम सबके सामने है.किसी भी दल को वहाँ की जनता ने स्पष्ट जनादेश नहीं दिया .लेकिन, बीजेपी लगभग बहुमत के आकड़े चुमते –चुमते रह गई और सबसे बड़े दल के रूप में ही भाजपा को संतोष करना पड़ा है. कौन मुख्यमंत्री पद की शपथ लेगा ? इस खंडित जनादेश के मायने क्या है ? क्या कर्नाटक की जनता ने कांग्रेस को खारिज़ कर दिया ? ऐसे बहुतेरे सवाल इस खंडित जनादेश के आईने में खड़े हो थे. सरकार बनाने के लिए तमाम प्रकार की जद्दोजहद कांग्रेस और जेडीएस ने किया किन्तु कर्नाटक की जनता ने बीजेपी को जनादेश दिया था इसलिए राज्यपाल ने संविधान सम्मत निर्णय लेते हुए बी.एस यदुरप्पा को सरकार बनाने का न्यौता भेजा. राज्यपाल के निर्णय से बौखलाई कांग्रेस आधी रात को सुप्रीम कोर्ट की शरण में गई लेकिन, उसे वहां भी मुंह की खानी पड़ी. खैर,बृहस्पतिवार की सुबह यदुरप्पा ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली.राज्यपाल के निर्देशानुसार पन्द्रह दिन के भीतर उन्हें  विधानसभा में बहुमत साबित करना होगा,फिलहाल अगर कर्नाटक की राजनीति को समझें तो बीजेपी के लिए यह बहुत कठिन नहीं होगा.क्योंकि जेडीएस और कांग्रेस के बीच हुए इस अनैतिक ग...

महाभियोग पर कांग्रेस का महाप्रलाप

सात विपक्षी दलों द्वारा मुख्य न्यायधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ़ दिए गए महाभियोग नोटिस को उपराष्ट्रपति ने यह कहते हुए ख़ारिज कर दिया कि मुख्य न्यायधीश के ऊपर लगाए गए आरोप निराधार और कल्पना पर आधारित है. उपराष्ट्रपति की यह तल्ख़ टिप्पणी यह बताने के लिए काफ़ी है कि कांग्रेस ने  किस तरह से अपने राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए महाभियोग जैसे अति गंभीर विषय पर अगम्भीरता दिखाई है. महाभियोग को अस्वीकार करने की 22 वजहें उपराष्ट्रपति ने बताई हैं. दस पेज के इस फ़ैसले में उपराष्ट्रपति ने कुछ महत्वपूर्ण तर्क भी दिए हैं. पहला, सभी पांचो आरोपों पर गौर करने के बाद ये पाया गया कि यह सुप्रीम कोर्ट का अंदरूनी मामला है ऐसे में महाभियोग के लिए यह आरोप स्वीकार नहीं किये जायेंगे. दूसरा, रोस्टर बंटवारा भी मुख्य न्यायधीश का अधिकार है और वह मास्टर ऑफ़ रोस्टर होते हैं. इस तरह के आरोपों से न्यायपालिका की स्वतंत्रता को ठेस पहुंचती है. तीसरा, इस तरह के प्रस्ताव के लिए एक संसदीय परंपरा है. राज्यसभा के सदस्यों की हैंडबुक के पैराग्राफ 2.2 में इसका उल्लेख है, जिसके तहत इस तरह के नोटिस को पब्लिक करने की अनुमति नहीं ...

कर्नाटक चुनाव : सियासी वर्चस्व की लड़ाई

दक्षिण भारत के प्रमुख राज्यों में से एक कर्नाटक में होने वाले विधानसभा चुनाव की घोषणा चुनाव आयोग ने कर दी है.प्रदेश की 224 सीटों पर एक ही चरण में 12 मई को मतदान संपन्न होंगे और 15 मई को नतीजे सामने आएंगे. गौरतलब है कि चुनाव आयोग मतदान की तारीखों का एलान से पहले ही प्रदेश का राजनीतिक पारा अपने उफान पर है.भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों के शीर्ष नेतृत्व के दौरे से राजनीतिक सरगर्मियां बढ़ी हुई हैं.चुनावी बिगुल के साथ यह तय हो गया कि प्रदेश का सियासी पारा अब शांत होने वाला नहीं है.पहले कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी दो दिन के कर्नाटक दौरे पर गये,उसके तुरंत बाद भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का कर्नाटक दौरा इस बात की तरफ स्पष्ट संकेत दे रहा है कि कर्नाटक चुनाव को दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों के लिए सियासी वर्चस्व की लड़ाई है.कांग्रेस के लिए कर्नाटक का चुनाव न केवल बेहद महत्वपूर्ण है.बल्कि चुनाव के परिणाम भविष्य की राजनीति में कांग्रेस के आस्तित्व को भी रेखांकित करेंगे.कर्नाटक आखिरी बड़ा राज्य बचा है जहाँ कांग्रेस सत्ता में बनी हुई है.ऐसे में कांग्रेस किसी भी स्थिति में यह नहीं चाहेगी कि कर्नाटक की सत...