Skip to main content

Posts

कर्नाटक चुनाव : सियासी वर्चस्व की लड़ाई

दक्षिण भारत के प्रमुख राज्यों में से एक कर्नाटक में होने वाले विधानसभा चुनाव की घोषणा चुनाव आयोग ने कर दी है.प्रदेश की 224 सीटों पर एक ही चरण में 12 मई को मतदान संपन्न होंगे और 15 मई को नतीजे सामने आएंगे. गौरतलब है कि चुनाव आयोग मतदान की तारीखों का एलान से पहले ही प्रदेश का राजनीतिक पारा अपने उफान पर है.भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों के शीर्ष नेतृत्व के दौरे से राजनीतिक सरगर्मियां बढ़ी हुई हैं.चुनावी बिगुल के साथ यह तय हो गया कि प्रदेश का सियासी पारा अब शांत होने वाला नहीं है.पहले कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी दो दिन के कर्नाटक दौरे पर गये,उसके तुरंत बाद भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का कर्नाटक दौरा इस बात की तरफ स्पष्ट संकेत दे रहा है कि कर्नाटक चुनाव को दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों के लिए सियासी वर्चस्व की लड़ाई है.कांग्रेस के लिए कर्नाटक का चुनाव न केवल बेहद महत्वपूर्ण है.बल्कि चुनाव के परिणाम भविष्य की राजनीति में कांग्रेस के आस्तित्व को भी रेखांकित करेंगे.कर्नाटक आखिरी बड़ा राज्य बचा है जहाँ कांग्रेस सत्ता में बनी हुई है.ऐसे में कांग्रेस किसी भी स्थिति में यह नहीं चाहेगी कि कर्नाटक की सत...

खुद ही हास्य की पात्र बन गई कांग्रेस !

  इराक़ के मोसुल में जून 2014 से लापता 39 भारतीयों के जिंदा वापस लौटने की धुंधली उम्मीदें भी गत दिनों दफ़न हो गई हैं.जिसको लेकर कांग्रेस ने जिस ओछी राजनीति का परिचय सदन के अंदर और सदन के बाहर दिया देश ने उसको देखा.इसके बाद कांग्रेस की जम कर फ़जीहत भी हुई है.कांग्रेस ने अपने ट्विटर हैंडल पर लोगो का मत जानने के लिए एक सवाल पूछा.सवाल कुछ इस तरह से था इराक़ में मारे गये 39 भारतीयों की मौत विदेश मंत्री की बड़ी असफ़लता है ? .इस सवाल का जवाब लगभग 33,789 लोगों ने दिया जिसमें 76% लोगों ने कांग्रेस के इस सवाल को सिरे से खारिज़ कर किया.इस पोल के कारण कांग्रेस की खूब भद्द ही नहीं पिटी बल्कि जनता ने कांग्रेस की  शर्मनाक राजनीति को तत्काल आईना दिखाया है. बहरहाल,विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने कुछ दिनों पहले यह दुखद जानकारी देते हुए बताया कि लापता हुए ये सभी भारतीय आइएस के आतंकियों के द्वारा मारें जा चुके हैं.इनके शवों के अवशेष मोसुल के बदूश स्थित गावं में मिला है.समूचे देश के लिए यह एक दुखद और पीड़ादायक घटना है.गौरतलब है कि  भारत सरकार इराक़ के सहयोग से लंबे समय से इस जद्दोजहद में लगी हुई थी क...

दुष्प्रचार की डगमगाती नैया के बीच गतिशील संघ !

यह एक सामान्य सत्य है कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को लेकर तमाम प्रकार की भ्रांतियां एवं दुष्प्रचार लंबे समय से देश में चलता रहा है.कांग्रेस एवं मीडिया से जुड़े बुद्दिजीवियों का एक धड़ा संघ को एक साम्प्रदायिक एवं राष्ट्र विरोधी संगठन जैसे अफवाहों को हवा देने की जिम्मेदारी अपने कंधो पर ले रखी है.किंतु वर्तमान समय में इनका   हर दावं विफ़ल साबित हो रहा है,जिससे तंग आकर इस कबीले के लोगों ने नया ढंग ईजाद किया है.वह है संघ से जुड़े पदाधिकारियों के बयान को अपनी सुविधा और अपने वैचारिक हितों की पूर्ति के मद्देनजर दिखाना.ताज़ा मामला संघ प्रमुख मोहन भागवत के बिहार के मुजफ्फरपुर में रविवार को दिए भाषण का है.संघ प्रमुख ने स्वयं सेवकों को संबोधित करते हुए कहा कि “हमारा मिलिट्री संगठन नहीं है मिलिट्री जैसी डिसिप्लिन हमारी है और अगर देश को जरूरत पड़े और देश का संविधान,कानून कहे तो, सेना तैयार करने में छह –सात महीने लग जायेंगे,संघ के स्वयंसेवक को लेंगे तो तीन दिन में तैयार हो जाएगा.यह हमारी क्षमता है लेकिन, हम मिलिट्री संगठन नहीं है पैरामिलिट्री भी नहीं हैं हम तो पारिवारिक संगठन हैं” मोहन भागवत के ...

कृषि और ग्रामीण विकास के लिए जरूरी बजट

 आर्थिक समीक्षा आने के पश्चात् यह अंदाज़ा हो गया था कि वित्त मंत्री अरूण जेटली आगामी बजट को राजनीतिक महत्वाकांक्षा से परे एक ठोस बज़ट प्रस्तुत करेंगे.जिसमें ग्रामीण, कृषि और रोजगार पर ज्यादा फोकस रहेगा.हुआ भी ऐसा ही ,वित्त मंत्री अरूण जेटली ने 2018-19 के आम बजट में ग्रामीण विकास, ग्रामीण रोजगार और स्वास्थ्य को लेकर कई अहम योजनाओं की घोषणाएं की. जो आगमी वर्षों में किसान और ग्रामीण जनता के जीवन में सकरात्मक बदलाव ला सकते हैं. जाहिर है कि जब भी आम बजट आता है सरकार अपने बजट को सराहती है, प्रसंशा करती है वहीँ विपक्ष बजट को लेकर आलोचनात्मक प्रतिक्रिया देता है किन्तु, आम जनता ,गावं की जनता इस आस में जरूर रहती है इस बजट में उसके लिए क्या खास है ? अमूमन यह देखने को मिलता है बजट को सत्ता पक्ष समावेशी और समग्र विकास वाला बजट ,ग्रामीण और कृषि केन्द्रित बजट कहते हैं लेकिन,  यह पहली बार हो रहा है कि 2018-2019 के बजट को प्रधानमंत्री नए भारत का बजट कहा है. गौरतलब है कि 2022 में भारत अपनी स्वतंत्रता के 75वीं वर्षगाठ मनाएगा,इस आज़ादी के साल को प्रधानमंत्री ने नए भारत की परिकल्पना की है. जिसमें...

आतंकी संगठनों पर कार्यवाही करे पाक

जब समूचा विश्व नए साल के जश्न में डूबा हुआ था उसी वक्त अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान को कड़ी फटकार लगाते हुए झूठा और कपटी देश बताते हुए अमेरिका द्वारा पाकिस्तान को दिए जा रहे वित्तीय सहायता के उपयोग और अपने ही देश की नीति पर गंभीर प्रश्न खड़ा किये .अमेरिका के राष्ट्रपति ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि पाकिस्तान को जो मदद आतंक के खात्मे के लिए प्रदान की जा रही थी उसे पाक आतंकियों की मदद में लगा रहा है.गौरतलब है कि अमेरिका पाकिस्तान को  विगत पंद्रह साल में 33 अरब डॉलर की भारी रकम इसलिए देता रहा ताकि पाकिस्तान इससे आतंकियों से निपट सके.किन्तु पाकिस्तान इस धन का उपयोग शुरू से ही आतंकियों  की नस्ल को तैयार करने में,उन्हें आधुनिक हथियारों से लैस करने में लगाता रहा.जिससे कुकुरमुत्ते की भांति आतंकी संगठन तैयार हो गए और पाकिस्तान इन आतंकी संगठनों का सबसे बड़ा पनाहगाह देश बन गया.इसके बाद से वाइट हाउस ने कार्यवाही करते हुए 1626 करोड़ रूपये की सैन्य सहायता को रोक दिया है वर्तमान समय में आतंकियों को संरक्षण देने वाला देश बन चुका पाकिस्तान खुद इसके गिरफ़्त में है बावजूद इसके...

कबतक जारी रहेगा गतिरोध ?

     विगत दो साल से सरकार और न्यायपालिका के बीच जमी बर्फ पिघलने का नाम नहीं ले रही.यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि कई बार सार्वजनिक मंचों से कभी न्यायपालिका सरकार को निशाने पर लेने से नहीं चुकती तो , सरकार भी न्यायपालिका को कार्यपालिका के कामों में दखल न देने की सलाह देने से बाज़ नहीं आती.लेकिन , प्रधानमंत्री हर बार इस जमी बर्फ को मंच से ही पिघलाने की कवायद करते नजर आते हैं. विगत दिनों संविधान दिवस के मौके पर कुछ ऐसा ही हुआ विधि मंत्री रविशंकर प्रसाद ने मंच से ही न्यायपालिका को आड़े हाथो लेते हुए अपरोक्ष रूप से पुन: राष्ट्रीय न्यायिक न्युक्ति आयोग की वकालत करने से नहीं चुके.वहीँ मुख्य न्यायधीश दीपक मिश्रा ने रविशंकर प्रसाद को जवाब देते हुए कहा कि नगारिकों के मौलिक अधिकार सबसे ऊपर हैं. उन्होंने संविधान द्वारा न्यायपालिका की तय की गई भूमिका को याद दिलाते हुए कहा कि संविधान ने न्यायपालिका को संविधान के संरक्षक की भूमिका सौंपी है , जिसका निर्वहन न्यायपालिका समय-समय पर करती आई है. इससे पहले केन्द्रीय मंत्री अरूण जेटली  ने भी न्यायिक सक्रियता पर सवाल उठाते हुए कहा था कि न्यायप...

देश के आर्थिक सुधारों पर वैश्विक स्वीकार्यता

पिछला सप्ताह नरेंद्र मोदी सरकार को काफ़ी राहत देने वाला रहा है.एक तरफ़ उनकी लोकप्रियता को लेकर आया सर्वेक्षण जहाँ व्यतिगत तौर पर मोदी और बीजेपी को आश्वस्त करता है वहीँ, नोटबंदी और जीएसटी के बेज़ा विरोध में जुटे विपक्ष को अंतरराष्ट्रीय क्रेडिट रेटिंग एजेंसी मूडिज़ ने भारत की क्रेडिट रेटिंग को बढ़ाकर करारा झटका दिया है.गौरतलब है कि अमेरिकी थिंक टैंक प्यू रिसर्च सेंटर द्वारा करवाए गये सर्वे में आज भी नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता बरकरार है.इस सर्वे में 24,464 लोगों को शामिल किया गया.जिसके आंकलन के उपरांत यह बात निकल कर सामने आई कि 88 प्रतिशत लोगों की आज भी पहली पसंद नरेंद्र मोदी हैं. यह सर्वेक्षण फ़रवरी और मार्च के बीच किया गया इसमें एक तर्क यह भी है उसवक्त जीएसटी लागू नहीं किया गया था.पर,यह स्याह सच है कि जबसे नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री में उम्मीदवार घोषित हुए तबसे अभी तक सत्ता में आये साढ़े तीन साल होने को हैं किन्तु प्रधानमंत्री की लोकप्रियता में कमी देखने को नहीं मिली है.उससे भी ज्यादा हैरान करने वाली बात यह है कि यह सर्वे उस वक्त किया गया जब देश की आम जनता नोटबंदी के कारण हुई परेशानियों से...