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कॉल ड्राप पर दीर्घकालिक उपाय जरूरी

    कॉल ड्राप को लेकर मुआवजे की आस लगाएं उपभोक्ताओं को सुप्रीम कोर्ट ने करारा झटका दिया है.बुधवार को कॉल ड्राप मामले पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने  टेलीकॉम कंपनियों को राहत देते हुए भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण के उस फैसले को गैरसंवैधानिक करार दिया जिसमें ट्राई ने कॉल ड्राप होने पर ग्राहकों को मुआवजा देने की बात कहीं थी.माननीय कोर्ट ने इस फैसले को सुनाते हुए कहा कि कॉल ड्रॉप के लिए टेलिकॉम कंपनियों द्वारा ग्राहकों को क्षतिपूर्ति करने वाला ट्राई का आदेश अनुचित और गैर-पारदर्शी हैं.कोर्ट के इस फैसले के बाद टेलिकॉम कंपनियों ने राहत की साँस ली हैं,इस मामले में ट्राई  ने दलील देते हुए कहा कि मोबाईल कंपनियों को उपभोक्ताओं की कोई चिंता नहीं है.करोड़ो उपभोक्ताओं के देश में चार –पांच कंपनियों ने कब्जा कर रखा है जो कार्टेल की तरह काम कर रहीं हैं.कई बार ये तथ्य भी सामने आयें है कि बड़ी कंपनियां जान –बुझ कर कॉल ड्राप कर देतीं हैं जिससे उनको लाखों –करोड़ो का लाभ होता हैं.इनका रोज़ाना 250 करोड़ का राजस्व है लेकिन निवेश नाम मात्र का है,ट्राई के इस मसले पर कोर्ट को ये भी बता...

सस्ती लोकप्रियता पाने की कवायद

    देश में कई ऐसे ज्वलंत मुद्दे है जिसपर व्यापक चर्चा तथा विचार –विमर्श बहुत जरूरी है.मसलन किसानों का हालात दिन –ब-दिन  दयनीय होती जा रही है,देश के अधिकतर राज्य जल संकट से जूझ रहें हैं,देश की शिक्षा व्यस्वथा में सुधार की जरूरत हैं,देश में गरीबों,मजदूरों की हालात खराब होती जा रहीं हैं.बढ़ते महंगाई से आमजन त्रस्त है,ऐसे हमारे पास सैकड़ो मुद्दे है जिसपर हमारे सियासतदान बोलने की जहमत नहीं उठाते.यदि जहमत भी उठाते हैं तो चुनाव के मौके पर,उसके बाद भूल जाते हैं.चाहें वो दल सत्ता पक्ष हो या विपक्ष में,ये आज की राजनीति का गिरता स्तर ही हैं कि हमारे राजनेता आरोप –प्रत्यारोप के इस दौर में निजता पर भी हमला करने से नहीं चुकते.बहरहाल जबसे मोदी सत्ता की कमान संभालें हैं उनके आलोचकों ने हर मुद्दे पर उनकी आलोचना की हैं.लोकतंत्र के मूल्यों को समझे तो सरकार की आलोचना होनी भी चाहिए किंतु आलोचना में तर्क और तथ्य हो,सरकार की नीतियों और योजनाओं की आलोचना होनी चाहिए किंतु मोदी सरकार के दौरान कई ऐसे मामले सामने आयें जहाँ उनके आलोचकों ने विरोध की सारी हदों को पार कर दिया.इस समय दिल्ली के मुख्यमंत्...

सिद्धरमैया को बर्खास्त करे आलाकमान

        भ्रष्टाचार के आरोपों से चौतरफा घिरी कांग्रेस की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रहीं हैं.वर्तमान दौर में कांग्रेस की परिस्थिति देखकर ऐसा लग रहा है मानों कांग्रेस के राज्य और राष्ट्रीय स्तर के नेताओं में भ्रष्टाचार करने की प्रतिस्पर्धा चल रहीं हो.एक तरफ राष्ट्रीय नेतृत्व भ्रष्टाचार के आरोपों से घिर रहा हैं तो, वहीँ दूसरी तरफ कांग्रेस शासित राज्य कर्नाटक से जो खबर आ रही है.वो किसी भी सूरतेहाल में कांग्रेस के लिए सही नहीं हैं.जाहिर है कि कर्नाटक के मुख्यमंत्री  सिद्धरमैया की कई मसलों पर पहले भी किरकिरी हो चुकी है.इसबार आरोप है कि मुख्यमंत्री सिद्धरमैया अपने बेटे को सरकारी अस्पताल में लैब और डायग्नोस्टिक सुविधा बनाने का ठेका सभी नियम –कानून को ताक पर रखते हुए दे दिया है.मामला जैसे ही सामने आया एकबार फिर सिद्धरमैया सबके निशानें पर आ गये है. विपक्ष इस पुरे मुद्दे की जाँच सीबीआई से कराने की मांग करने लगा है,बढ़ते दबाव के बीच उनके बेटे यतींद्र सिद्धरमैया ने मैट्रिक्स इमेजिंग सल्यूशन इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के डायरेक्टर पद से इस्तीफा दे दिया है.गौरत...

लंबित मुकदमों का निस्तारण जरूरी

     देश के मुख्य न्यायाधीश टीएस ठाकुर बेटे विगत रविवार को मुख्यमंत्रियों एवं उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायधीशों के सम्मलेन को संबोधित करते हुए भावुक हो गये.दरअसल अदालतों पर बढ़ते काम के बोझ और जजों की घटती संख्या की बात करतें हुए उनका गला भर आया.चीफ जस्टिस ने अपने संबोधन में पुरे तथ्य के साथ देश की अदालतों व न्याय तंत्र की चरमराते हालात से सबको अवगत कराया.भारतीय न्याय व्यवस्था की रफ्तार कितनी धीमी है.ये बात किसी से छिपी नहीं है,आये दिन हम देखतें है कि मुकदमों के फैसले आने में साल ही नहीं अपितु दशक लग जाते हैं.ये हमारी न्याय व्यवस्था का स्याह सच है,जिससे मुंह नही मोड़ा जा सकता.देश के सभी अदालतों में बढ़ते मुकदमों और घटते जजों की संख्या से इस भयावह स्थिति का जन्म हुआ है.गौरतलब है कि 1987 में लॉ कमीशन ने प्रति 10 लाख की आबादी पर जजों की संख्या 50 करनें की अनुशंसा की थी लेकिन आज 29 साल बाद भी हमारे हुक्मरानों ने लॉ कमीशन की सिफारिशों को लागू करने की जहमत नही उठाई.ये हक़ीकत है कि पिछले दो दशकों से अदालतों के बढ़ते कामों पर किसी ने गौर नही किया.जजों के कामों में बेतहाशा बढ़ो...

गुलाम कश्मीर की सच्चाई दुनिया के सामने लाए भारत

जम्मू –कश्मीर ऐसे मसला है जिसका राग समय –समय पर पाकिस्तानी प्रधानमंत्री अलापते रहतें हैं,दुनिया के सामने ये झूठ बार-बार परोसते हैं कि जम्मू –कश्मीर में भारत की सेना वहां की आवाम पर जुल्म करती है,लेकिन स्थिति इसके ठीक विपरीत है,सच्चाई यह है कि पाक सरकार अपने अधिकृत कश्मीर के नागरिकों पर अत्याचार करती है,पाकिस्तान के खिलाफ उठने वाली हर आवाज को बंदूख की सहायता से दबाने का प्रयास करती है,दरअसल बुधवार को गुलाम कश्मीर के मुजफ्फराबाद में बेरोजगारी और गरीबी के विरोध में सैकड़ो युवा सड़क पर उतर आये,युवाओं का आरोप है कि पाकिस्तान सरकार स्थानीय नौकरियों में भी पाकिस्तान के युवकों को तरजीह देती है.ऐसे में इनके पास अपने जीविका का कोई साधन नहीं है.वहां के ज्यादातर युवा बेरोजगार हैं. जाहिर है कि स्थानीय नौकरियों में भी पाक सरकार इनका हक नही देती.इस भेदभाव से तंग आकर कश्मीर नेशनल स्टूडेंट्स फेडरेशन और जम्मू कश्मीर नेशनल आवामी पार्टी के नेतृत्व में युवाओं ने जमकर पाकिस्तान सरकार के खिलाफ नारे लगायें.उनमे से कुछ नारे इसप्रकार से थे -हम कश्मीर बचाने निकलें हैं आओं हमारे साथ चलो, पाकिस्तान मुर्दाबाद ये ...

इस त्रासदी का ज़िम्मेदार कौन ?

               केरल के पुत्तिंगल देवी मंदिर में रविवार के तड़के आग  लगने से अबतक लगभग 112 लोग काल की गाल में समा गये है,जबकि 350 से अधिक लोग घायल हो गयें हैं.दरअसल इस मंदिर हर साल की भांति इस साल भी नये साल का उत्सव मनाया जा रहा था.जिसमें आतिशबाजी की प्रतियोगिता रखी गई थी,इसी दौरान पटाखें की एक चिंगारी उस जगह पर जा गिरी जहाँ बड़ी मात्रा में पटाखें रखें हुए थें.इससे इतना भीषण विस्फोट हुआ कि इसकी चपेट में मंदिर सहित आस –पास के मकान कुछ ही देर में मलबे मे तब्दील हो गये .इस आगजनी के बाद मची भगदड़ ने सैकड़ो श्रद्धालुओं को अपनी चपेट में ले लिया .हादसें के बाद राहत व बचाव जोरो पर है.इन सब के बीच राज्य सरकार ने इस पुरे मामले की न्यायिक जाँच कराने के आदेश दे दिए हैं.एक बात तो स्पष्ट है कि यह हादसा मंदिर में आतिशबाजी जैसी कुप्रथा के चलते हुई है,लेकिन इस हादसे के  बाद बुनियादी सवाल यही उठता है कि इस त्रासदी का जिम्मेदार कौन है ? सवाल की तह में जाएँ तो केरल के गृह मंत्री ने अपने बयान में कहा है कि प्रशासन ने मंदिर परिसर में आतिशबाजी की ...

परमाणु सुरक्षा पर आतंक का मंडराता खतरा

        अमेरिका की राजधानी वाशिंगटन में परमाणु सुरक्षा जैसे गंभीर विषय को लेकर पचास के अधिक देशों के राष्ट्राध्यक्षों ने विचार –विमर्श किया.इस शिखर सम्मलेन के मुख्य उद्देश्य परमाणु सुरक्षा पर मंडराते खतरे को रोकना था.सभी देशों के राष्ट्राध्यक्षों ने इस विषय पर चिंता जाहिर की कि परमाणु अस्त्र  निर्माण में इस्तेमाल होने वालें युरेनियम और प्लूटोनियम पदार्थ को सुरक्षित कैसे रखा जाए.जाहिर है कि बोको हरम,इस्लामिक स्टेट और अलकायदा जैसे आतंकी संगठन परमाणु हथियार और उसकी तकनीक हासिल करने की फिराक में लगे हैं,ऐसे में परमाणु अस्त्रो को सुरक्षित करना सभी परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्रों का प्रमुख दायित्व है.लेकिन मौजूदा परिस्थितियों कुछ राष्ट्र इस मसले पर गंभीर नही हैं.जिसमें आतंक परस्त पाकिस्तान और उत्तर कोरिया प्रमुख हैं,एक तरफ में चरमपंथी ताकतें मजबूत हो रहीं तो दूसरी उत्तर कोरिया बार –बार अपने परमाणु शक्ति का परीक्षण कर रहा है,ऐसा में स्थिति और गंभीर हो जाती है.बहरहाल,अगर हम परमाणु सुरक्षा शिखर सम्मेलनों की पृष्टभूमि पर नजर डालें तो अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा क...